मैं राजनीति नहीं जानती परन्तु मुझे नाम पता हैंजो सत्ता में हैं, और मैं उनके नाम दुहरा सकती हूँ
जैसे की हफ्ते के दिनों के नाम, या महीनो के नाम, नेहरू से शुरू करते हुए।
मैं भारतीय हूँ, कृष्णवर्णी , मालाबार में जन्मी
मैं तीन भाषाएँ बोलती हूँ , लिखती हूँ
दो में, और सपने एक में देखती हूँ।
अंग्रेजी में मत लिखो, उन्होंने कहा, अंग्रेजी
तुम्हारी मातृ भाषा नहीं है। क्यों मुझे नहीं छोड़ देते
अकेले, आलोचक, मित्र, और मिलने आये चचेरे भाई बहन,
तुम सब लोग? क्यों नहीं मुझे बोलने देते
जो भाषा मैं चाहूँ? जो भाषा मैं बोलती हूँ
वो मेरी बन जाती है, इसके विरूपण, इसकी विलक्षणता
सब मेरे हैं, सिर्फ मेरे।
ये आधी अंग्रेजीयत है, आधी भारतीयता, शायद हास्यजनक, पर ये सच है
ये उतनी ही मानवीय है जितनी की मैं, क्या तुम्हें
नहीं दीखता? ये आवाज बनती है मेरी खुशियों की, मेरी लालसाओं की, मेरी
आशाओं की, और ये मेरे लिए उतनी ही कामदार है जितनी की काँव काँव
कौवों के लिए और दहाड़ शेरों के लिए, ये
मानवीय भाषा है, भाषा उस मानस की जो
इधर है और उधर नहीं, मानस जो देखता है, जो सुनता है और
जो जागरूक है. ये बहरी, अंधी भाषा नहीं है उन
आंधी में वृक्षों की या मानसून के मेघो की या वर्षा की या
असंगत बुदबुदाहट जलती हुई
चिता के ढेर की। मैं बच्ची थी, और फिर उन्होंने
मुझे बताया की मैं बड़ी हो गयी हूँ, क्योकि मैं लम्बी हो गयी थी, मेरे अंग
सूज गए थे और एक दो जगह पर बाल उग गए थे।
जब मैंने उनसे स्नेह माँगा, ना जानते हुए की और क्या मांगू
तो वो ले आये एक सोलह साल का लड़का
शयनकक्ष में और दरवाजे बंद कर दिए, उसने मुझे मारा नहीं
परन्तु मेरा दुखी महिला शरीर पिटा हुआ सा महसूस किया।
मेरे स्तनों और मेरी गर्भ के भार ने मुझे कुचल दिया
और मैं बेचारी सी कंपकंपा गयी।
तब... मैंने एक कमीज पहन ली और अपने
भाई का पजामा, बाल छोटे काट दिए, और नजरअंदाज कर दिया
अपना स्त्रीत्व। साड़ी पहनो, लड़की बनो,
पत्नी बनो, उन्होंने मुझे बताया। कड़ाई करो, रसोई देखो,
नौकरो से झगड़ो। हिसाब से रहो। जहाँ तुम्हारी जगह है
वहां रहो, नियम बनाने वाले चिल्लाये। दीवारों पर नहीं
बैठना और हमारी किनारीदार खिड़कियों से बाहर झलक नहीं दिखाना।
एमी बनो, या कमला बनो। या इससे अच्छा
माधवीकुट्टी बने रहो। समय आ चुका है
कि एक नाम पसंद कर लो, और एक भूमिका। बहानो के खेल नही खेलो।
पागलपन और उन्माद में ना रहो। प्यार में ठोकर खाकर
शर्म से दहाड़ के ना रोओ... मैं एक आदमी से मिली , उसे प्यार किया। उसे
किसी एक नाम से ना बुलाओ, वो हर एक आदमी है
जो चाहता है एक औरत, उसी तरह जैसे मैं हूँ हर एक
औरत जो खोजती है प्यार। उसमें... भूख नदियों
के जल्दबाजी सी, मुझमें... सागर का अथक
इन्तजार। तुम कौन हो, मैं सबसे पूछती हूँ ,
सबका जवाब यह है कि, मैं मैं हूँ। सब जगह और,
हर जगह, मैं देखती हूँ उसे जो खुद को मैं कहता है
इस दुनिया में, वो अच्छे से बंधा हुआ है जैसे कि
तलवार अपनी म्यान में। मैं हूँ जो अकेले पीती हूँ
शराब बारह बजे, आधी रात को, अजीब शहरों के होटलों में,
मैं हूँ जो हंसती हूँ, मैं हूँ जो प्रेम करती हूँ
और फिर, शर्म महसूस करती हूँ, मैं हूँ जो लेटे हुए मरती हूँ
गले में खड़खड़ के साथ। मैं पापी हूँ,
मैं संत हूँ। मैं प्रेमिका हूँ और मैं ही
ठुकरायी हुई हूँ। मेरी कोई ऐसी खुशियां नहीं है जो तुम्हारी नहीं हैं, कोई
दर्द ऐसे नहीं जो तुम्हारे नहीं। मैं भी खुद को मैं ही बुलाती हूँ।
- कमला दास। Summer in Calcutta किताब से अंग्रेजी से अनूदित।
Kamala Das was a fierce poet from Thrissur, Kerala. She challenged patriarchy openly in her poems. An introduction is one such poem where she fiercely criticizes patriarchy. One of my Malayali friend told me that many orthodox family in Kerala won't allow their kids to read Kamala Das. Nothing could describe the author's boldness more.
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